रविवार, 4 जून 2017

यह महामृत्युंजय मंत्र ऋगवेद से उत्पन्न है। इसके उच्चारण मात्र से मृत्यु का भय हर जाता है। मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी यह मंत्र सरल कर देता है। महामृत्युंजय के मन्त्र का जाप १ ० ८ बार करने से इच्छित फल प्राप्ति होती है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं  पुष्टिवर्धनं। 

उर्वारुकमिव बंधनां मृत्योर्मुक्षीय   माम्रतात || 

यह महामृत्युंजय मंत्र ऋगवेद से उत्पन्न है। इसके उच्चारण मात्र से मृत्यु का भय  हर जाता है। मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी यह मंत्र सरल कर देता है। महामृत्युंजय के मन्त्र का जाप १ ० ८ बार करने से इच्छित फल प्राप्ति होती है। 

 आइये इस महामंत्र को गहराई से समझें :

हालाकि यह मंत्र ॐ शब्द से आरम्भ होता है लेकिन ऋग्वेद में ये ॐ शब्द नहीं हैं। यह ॐ शब्द हर मंत्र के आरम्भ में श्रीगणेश के स्मरण में जोड़ दिया जाता है ताकि मंत्र का जाप निर्विघ्न हो सके। 

त्रयम्बकं (त्र्यंबकं ) -ये शब्द शिव के  तीन नेत्रों का प्रतीक है। इसमें -

त्र्य -का मतलब तीन 

अम्बकम -का अर्थ है आँखें या नेत्र। 

यही 'ब्रह्मा -विष्णु -महेश ' यानी त्रिमूर्ति का प्रतीक है। त्र्यम्बकम शब्द को फिर एक बार गहराई से देखें -इस शब्द में एक और शब्द छिपा हुआ है -अम्बा यानी महाशक्ति जिसमें सरस्वती -लक्ष्मी -गौरी समाई है। यानी एक ही त्र्यंबकम शब्द में शिव और शक्ति का वास है। 

यजा-महे  यानी मैं आपका गुणगान करता हूँ। 

सुगन्धिं -यानी सुगंध ये सुगंध है प्राण -प्रभु ,उपस्थिति एवं आत्मबल का। 

इसी सुगंध से मानव त्रियंबकं की आराधना करते हैं। 

पुष्टिवर्धनं -यानी हे , हर !संसार तुम्ही से आरम्भ होता है और तुम्ही में उसी का अंत है। 

पुष्टिवर्धनं यानी हितकर (हितकारी ). 

तुम्हारा आदि अंत और मध्य नहीं है। हम सब तुम्हारे बच्चें हैं। आप ही परमपिता हो। आप ही हमें वर दे सकते हो। 

उर्वारुक्मेव -

यहां उर्वा का अर्थ विशाल है। और -

रुक्मेव का मतलब है -रोग। 

इसलिए उर्वारुकमिव का मतलब है हमें विशाल रोगों ने या अवगुणों ने घेर रखा है। जैसे के अविद्या ,असत्य और षदरिपु यानी की कमज़ोरी। ये कमज़ोरी और असत्य ही है जिनकी वजह से ये जानते हुए भी कि आप हर जगह हैं हम अपने कान और नेत्रों की ही बात मानते हैं। 

बंधनां  -इस शब्द को उर्वारुकमिव के साथ पढ़ना चाहिए।तब इसका अर्थ निकलता है ,जिन विशाल अवगुणों से हमें बाँध के रखा है यानी उर्वारुकमिव बंधनां। 

मृत्योर मोक्ष्य -अर्थात जिन अवगुणों ने हमें बांध के रखा है जिसकी वजह से ही हमें अकस्मात मृत्यु का सामना करना पड़ता है बदकिस्मती से हमें बाँध के रखा गया है और जन्म मृत्यु के इस चक्र से हमें मोक्ष नहीं मिलता, इसी चक्र से हमें मोक्ष दिलाइये। 

यमां  -अमृतात-अर्थात  आप ही अमृत दीजिये जिससे मुझे मोक्ष एवं निर्वाण प्राप्ति हो। 

https://www.youtube.com/watch?v=Br3Ed_D2ydc 

शुक्रवार, 2 जून 2017

भाव -सार :कृष्ण सखा हैं उद्धवजी के ,ब्रह्म ग्यानी उद्धव निर्गुण ब्रह्म उपासक हैं । गोपियाँ सगुण ब्रह्म की उपासक हैं प्रेमाभक्ति से संसिक्त हैं जहां विरह चरम है प्रेम का ,जो ईशवर के निकट ले आता है ,उपासक और उपास्य में अभेद हो जाता है, लेकिन भक्ति का स्वाद चखाने तथा ये जतलाने के भक्ति के बिना ज्ञान अधूरा है ऊधौ जी को कृष्ण गोपियों के पास भेजते हैं।गोपियों को कृष्ण प्रेम (विरह )में व्याकुल देख उनका अभिमान चूर -चूर हो जाता है ,वह मन में संकल्प लेते हैं अगले जन्म में प्रभु मुझे ब्रज की घास बनाना ताकि प्रेमासिक्त गोपियों के चरण रज को मेरा मस्तक मिल सके।



     ज्ञान तिहारो आधो अधूरो मानो या मत मानो ,

     प्रेम में का  आनंद रे उधौ ,प्रेम करो तो जानो।  

     प्रेम की भाषा न्यारी है ,
    
      ये ढ़ाई अक्षर प्रेम एक सातन पे भारी है। 

     कहत नहीं आवै सब्दन में ,

     जैसे गूंगो गुड़ खाय स्वाद पावै मन ही मन में। 

                              (१ )

   का करें हम ऐसे ईश्वर को ,जो द्वार हमारे आ न सके ,

   माखन की चोरी कर न सके ,मुरली की तान सुना न सके। 

   मन हर न सके ,छल कर न सके ,दुःख  दे न सके तरसा न सके। 

   जो हमरे हृदय लग न सके ,हृदय से हमें लगा न सके। 

   ऐसो ईश्वर छोड़ हमारे मोहन को पहचानो ,

   प्रेम में का आनंद रे उधौ ,प्रेम करो तो जानो। 

   प्रेम की मीठी बाणी  है ,खारो है ज्ञान को सिंधु ,

   प्रेम जमुना को पानी है। प्रेम -रस बहि रह्यो नस -नस में ,

   अरे ,नैन -बैन ,सुख -चैन ,रेन -दिन ,कछु नाहीं बस में। 

                           (  २ )

  ब्रह्म ज्ञान को कछु दिना ,छींके पे धर देओ ,

 हम गोपिन संग बैठ के ,प्रेम की शिक्षा लेओ। 

भले मानुस बन जाओगे ,जप -जोग ,ज्ञान तप छोड़ ,

प्रेम के ही गुण गाओगे ,निर्गुण को भूल मेरे गुण वारे के गुण गाओगे. 

कछु दिन रहि देखो ब्रज में ,है प्रेम ही प्रेम की गंध ,

यहां की प्रेम भरी रज में। 

                      (३ )

कोई मोहिनी मूरत ,सोहिनी सूरत जादिन जादू कर जाएगी ,

प्रेम की नागिन डस जाएगी ,ये वस्तर होंगे तार -तार ,

लट घूंघर सारी बिगर जाएगी।पीर करेजे भर जाएगी। 

 जब प्रेम की मदिरा चाखोगे ,तो ज्ञान की भाषा तर जाएगी ,

ऊधौ जब दशा बिगर जाएगी ,

डगमग -डगमग चाल चलोगे ,लोग कहें दीवानो ,

प्रेम में का आनंद रे ऊधौ ,प्रेम करो तो जानो। 

सखा बौराये डोलोगे ,यूं ही पगलाए डोलोगे ,

तुम ज्ञान की भाषा छोड़ हमारी बोली बोलेगे। 

प्रेम दधि ऊधौ का जानो ,है प्रेम जगत में सार ,

हमारे अनुभव की मानो। 

                 (४ )

दृढ करने को प्रेम पर उद्धव का विश्वास सखियाँ उनको ले चलीं ,

राधाजी के पास।  ये ही श्री राधारानी हैं ,

श्रीकृष्ण चन्द के अमर प्रेम की अमिट  कहानी हैं। 

इन्हें परनाम करो ऊधौ ,कछु धर्म -अर्थ काम और  मोक्ष को ,

मिल जायेगो सूधो। 

                     (५ )

ऊधौ जी  को मिल गयो ,सांचो प्रेम प्रमाण ,

भरम  गया संशय गयो ,जागो सांचो ज्ञान।

राम (कृष्ण )और राधे को संग जो पायो ,

तो आँख खुली और बुद्धि हिरानी ,

ऊधौ  बेचारो समझ नहीं पायो ,

के वास्तव क्या है क्या है कहानी। 

प्रेम की ऐसी अवस्था जो देखी तो ,

ज्ञान गुमान पे फिर गया पानी।

भगतन के बस में जो भगवन देखे ,

तो प्रेम और भक्ति की महिमा जानी। 

प्रेम से भर गया श्रद्धा से भर गयो ,

चरणों में परि गयो ब्रह्म को ग्यानी।

भाव -सार :कृष्ण सखा हैं उद्धवजी के ,ब्रह्म ग्यानी उद्धव निर्गुण ब्रह्म  उपासक  हैं । गोपियाँ सगुण ब्रह्म की उपासक हैं प्रेमाभक्ति से संसिक्त हैं जहां विरह चरम है प्रेम का ,जो ईशवर के निकट ले आता है ,उपासक और उपास्य में अभेद हो जाता है, लेकिन भक्ति का स्वाद चखाने तथा ये जतलाने के भक्ति के बिना ज्ञान अधूरा है ऊधौ जी को कृष्ण  गोपियों के पास भेजते हैं।गोपियों को कृष्ण प्रेम (विरह )में व्याकुल देख उनका अभिमान चूर -चूर हो जाता है ,वह मन में संकल्प लेते हैं अगले जन्म में प्रभु मुझे ब्रज की घास बनाना ताकि प्रेमासिक्त गोपियों के चरण रज को मेरा मस्तक मिल सके। 
अद्वैत वाद के प्रवर्तक आचार्यशंकर (शंकाराचार्य )ने    स्वयं अपने जीवन के आखिरी चरण में कृष्ण भक्ति के अनेक पद लिखें हैं ,देवकी पुत्र कृष्ण को यानी ब्रह्म के सगुन  स्वरूप को ही सर्वोपरि स्थान दिया है। 

भक्तिवेदांति ऐसा मानते हैं ब्रह्म ग्यानी ब्रह्म लोक तक जाता है कृष्ण भक्त (सगुन उपासक )गोलोक (कृष्ण लोक ,वैकुण्ठ )जाते हैं और वहीँ लय हो जाता है उनका कृष्ण में आवागमन से मुक्त हो जाते हैं भक्त। 

स्वयं ब्रह्मा की भी अपनी एक आयु है टेन्योर है फिर ब्रह्मज्ञानियों की कौन कहे ?
पुनरपि जनमम् पुनरपि मरणम ,पुनरपि जननी जठरे शयनम। 

https://www.youtube.com/watch?v=b9nf8spxNac

सोमवार, 29 मई 2017

ग़ज़ल :मुसाफिर -वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई )



ग़ज़ल :मुसाफिर -वीरेंद्र शर्मा (वीरुभाई )


मुसाफिर तो मुसाफिर है ,उसका घर नहीं होता ,
यूं सारे घर उसी के हैं ,वह बे -घर नहीं होता ,
ये दुनिया खुद मुसाफिर है ,सफर कोई घर नहीं होता ,
सफर तो आना जाना है ,सफर कमतर नहीं होता ।
मुसाफिर अपनी मस्ती में ,किसी से कम नहीं होता ,
गिला उसको नहीं होता उसे कोई गम नहीं होता ।
मुसाफिर का भले ही अपना कोई घर नहीं होता ,
मुसाफिर सबका होता है ,उसे कोई डर नहीं होता ।
गो अपने घर में अटका आदमी ,बदतर नहीं होता ,
सफर में चलने वाले से ,मगर बेहतर नहीं होता ।

सहभाव :डॉ .नन्द लाल मेहता "वागीश "

शनिवार, 27 मई 2017

इक रुकी हुई कविता मेरी , अधपकी हुई भविता मेरी ,


अच्छे -अच्छे रिश्तों को भी , नज़दीकियों ने तोड़ा है, कुछ तुम ठहरो कुछ हम संभले , अब फिर से दूरी हो जाए ,

"इक रुकी हुई कविता मेरी ,अधपकी हुई भविता मेरी "-कमांडर निशांत शर्मा 
                               (१) 
              इक रुकी हुई कविता मेरी ,

            अधपकी हुई भविता मेरी ,

            कुछ  आज यूं पूरी हो जाए,

            कुछ बादल गरजें सूरज पर ,

           ये शाम सिन्दूरी हो जाए। 

                         (२)
           बस खामखाँ की बातों में ,

          यूँ हम तुम जाया हो बैठे ,

          दो पल और बैठो संग मेरे ,

          कुछ बात ज़रूरी हो जाए। 

                      (३) 

          इक उम्र गुज़र गई सोने में ,

         खाबों को बुनकर खोने में ,

        कुछ ख्वाहिशों की अर्ज़ी को ,

         बस आज स्वीकृति हो जाए। 

                   (४ )

         रस्मों -कसमों  , कर्ज़ों -फ़र्ज़ों ,

         की तानाशही कौन सहे  ,

        अब सर आँखों पे हुक्म -ए -दिल ,

        कुछ 'जी -हुज़ूरी ' हो जाए ,

                  (५) 

         अच्छे -अच्छे रिश्तों को भी ,

        नज़दीकियों ने  तोड़ा है,

        कुछ तुम ठहरो कुछ हम संभले  ,

        अब फिर से दूरी हो जाए ,

        इक रुकी हुई कविता मेरी ,

        बस आज यूँ पूरी हो जाए। 


        प्रस्तुति :वीरुभाई 

बुधवार, 24 मई 2017

The Power Of The Moola Mantra (The Oneness ) मूल मंत्र की शक्ति (एकत्व )

https://www.youtube.com/watch?v=9ebpgVj3Wtg


The Power Of The Moola Mantra (The Oneness )
मूल मंत्र की शक्ति (एकत्व )
Whenever you chant the Moolamantra even without knowing the meaning of it ,that itself carries power .But when you know the meaning and chant with that feeling in your heart then the energy will flow million times more powerful .
जब भी आप मूल मंत्र का जाप करते हैं भले आपको इसका अर्थ- बोध (पता) न हो ,तब भी यह शक्ति लिए रहता है। शक्ति दायक होता है। और यदि मतलब भी इसका पता हो और हृदय उस भाव की अनुभूति और एहसास लिए हो तब ऊर्जा का यह परवाह दस लाख गुना हो जाता है।
The Mantra is like calling a name .Just like when you call a person he comes and makes you feel his presence ,the same manner when you chant this Mantra ,the supreme energy manifests everywhere around you .
यह किसी को नाम से बुलाने ,नाम बोलकर आवाहन करने के समान है। जैसे किसी व्यक्ति को पुकारने पर वह आ जाए और अपनी मौजूदगी का कराए ,ऐसे ही जब आप इस मंत्र को जपते हैं परमऊर्जा आपके गिर्द प्रकट होने लगती है।
As the universe is omnipresent ,the supreme energy can manifest anywhere and at any time .It is also very important to know that the invocation with all humility ,respect and with great necessity makes the presence stronger .
जैसे यह सृष्टि सब जगह मौजूद है (आकाश की तरह सबको आच्छादित किए है ,सब कुछ आकाश में मौजूद रहता है लेकिन आकाश लिपायमान नहीं होता किसी भी जड़ चेतन से अलिप्त ही रहता है ),यह परम ऊर्जा किसी भी जगह और और किसी भी समय (यानी स्थान और काल में कहीं भी कभी ही )प्रकट हो सकती है। महत्वपूर्ण यह जान ना भी बहुत ज़रूरी है ,इसका आवाहन पूरी विनम्रता ,आस्था ,आदर और ज़रूरियात के साथ करने पर इसका होना ,मौजूदगी , प्राकट्य भी प्रबलतर हो जाता है।
Mool Mantra
Om Sat Chit Anand Parabrahama,
Purushothama Paramatma ,
Sri Bhagvati Sametha ,
Sri Bhagvathe Namaha .
मूल मंत्र
ॐ सत चित आनंद परब्रह्मा
पुरुषोतमा परमात्मा
श्री भगवती समेत: (समेथा )
श्री भगवते (भगवथे ) नम :
हरी ॐ हरी ॐ हरी ॐ तत्सत ,हरी ॐ तत्सत
Om -
We are calling on the highest energy, of all there is .
ॐ -सबसे शक्तिमान परमऊर्जा का आवाहन कर रहें हैं हम
Sat -The Formless
सत -निराकार (अनंत ,अरूप ,सनातन अस्तित्व )
Chit -Consciousness of the universe
चित -सृष्टि का चेतन तत्व (अनंत ज्ञान स्वरूपा चेतना ,सब कुछ का ज्ञान रखने वाली )
Ananda -Pure love bliss and joy
आनंद -पवित्र प्रेम आह्लाद और ख़ुशी
Para Brahama -The supreme creator
परब्रह्मा -परम रचेता
Purushothama -Who has incarnated in human form to help guide mankind
पुरुषोतमा -जो मनुष्य रूप में मनुष्यता का मार्गदर्शन ,निदेशन करने के लिए प्रकट हुआ है।
Paramatma -Who comes to me in my heart and becomes my inner voice
whenever I ask
परमात्मा - जो मेरे हृदय में मेरी अंदरूनी(आंतरिक ) आवाज़ बन के कभी भी बुलाने पे आ जाता है।( मेरा हृदय ही जिसका वास है ,इसीलिए वह वासु है वासुदेव है )
Sri Bhagvate -The divine mother ,the power aspect of creation
श्री भगवते -दिव्यश्री माँ ,शक्ति स्वरूपा पहलू सृष्टि का (प्रकृति और पुरुष इसी से तो सृष्टि है )
Same Tha - Together within
समे था -एक साथ अंदर (और बाहर भी )
Sri Bhagvate-The father of creation which is unchangeable and permanent
श्री भगवते -सृष्टि पिता (मालिक ,मौला )
Namaha -I thank you and acknowledge this presence in my life . I ask for your guidance at all times
नम :(नमा :)-मैं तुम्हारा धन्यावाद (शुक्रिया ,साधुवाद )करता हूँ ,इस होने को ,आपकी मौजूदगी को मान्य पाता हूँ ,तस्दीक करता हूँ ,मानता हूँ। तुमसे पथ -प्रदर्शन मिलते रहने की हर दम मांग करता हूँ।
Om has hundred different meanings.It is said 'In the beginning was the supreme word and the word created everything .That word is Om '.If you are meditating in silence deeply ,you can hear the sound Om within .The whole creation emerged from the sound Om .
ॐ के अलग अलग सौ मायने -मतलब निकलते हैं। सृष्टि के आरम्भ में यही एक ध्वनि थी (जिसे अलग अलग धर्मों में बे -शक अलग अलग नामों से पुकारा गया है ). इसी एक ध्वनि से साड़ी सृष्टि ,सारा पसारा ,सारी कायनात उपजी ,पैदा हुई। यह एक शब्द ॐ है (सनातन वैदिक धर्म में ,कहीं ये ओअंकार है ,ओंकार ,प्रणव ,हुम् ,आमीन ,आमेन ,शालोम ,शिन ,मेम ,अलिफ़ ).यदि आप गहन अवस्था में डुबकी लगाए हैं ध्यान की आपको अपने अंदर यह ध्वनि ॐ सुनाई देगी। पूरी सृष्टि (ब्रह्माण्ड सारा )इसी से प्रसूत हुई है .
Sat Chit Ananda
सत चित आनंद (सच्चिदानंद )
Sat -The all penetrating existence that is formless ,shapeless ,omnipresent ,attributes less , and quality less aspect of the Universe . It is the Un -manifest . It is experienced as emptiness of Universe .......
सत -से अभिप्राय है सर्व -व्यापी अस्तित्व जो अरूप है ,जिसकी कोई आकृति -कोई मूरत नहीं है ,निराकार है,सब जगह मौजूद रहता है जो ,प्रत्येक काल में यकसां बना रहता है ,अपरिवर्तन शील (इसीलिए तो एक साथ सब जगह है ,आकार तो एक बार में एक ही जगह होगा ,छोटा या बड़ा अपना वही रूप लिए हुए ),निर्गुण है यानी तीनों गुणों सतो -रजो -तमो से परे ,यही ब्रह्म का निरंकार रूप है। निर्गुण कहा गया है इसे ही ,इसे कैसा भी कोई भी गुण देकर सीमित नहीं किया जा सकता है ,अनंत अस्तित्व है यह।
We could say it is the body of the Universe that is static .Everything that has a form and that can be sensed ,evolved out of this Un -manifest .It is so subtle that it is beyond all perceptions .......
हम कह सकते हैं ये ही है इस कायनात का बदन (देह ,शरीरा )जो थिर (स्थिर ,कायम रहता है सदा )है। हर आकारी चीज़ (आकार )इसी एक अव्यक्त से अभिव्यक्त हुआ है। यह इतना सूक्ष्म है जो हमारे बोध में नहीं आ पाता।
It can only be seen when it has become gross and has taken form .We are in the Universe and the Universe is in us .We are the effect and the Universe is the cause and the cause manifests itself as the effect.
स्थूल आकार ले लेने पर ही यह गोचर होता है दिखलाई देता है ,हम इस कायनात में हैं और कायनात हमारे अंदर है। हम कार्य(परिणाम ,प्रभाव ) हैं जिसका कारन यह सृष्टि है। और यह कारन ही प्रभाव में कार्य में हमारे होने में अभिव्यक्त हुआ है यानी कार्य -कारण दो हैं ही नहीं। तू मुझ में है,मैं तुझ में हूँ।
Chit -The pure consciousness of the Universe that is infinite ,Omni -present
manifesting power of the Universe
चित -सृष्टि की वह पावन ,निर -मल चेतना (ज्ञान -बोध )जो अनंत है। सर्वव्यापी है ,कायनात की ताकत (शक्ति स्वरूपा )होके प्रकट हुई है।
Out of this is evolved everything that we call Dynamic energy or force .It can manifest in any form or shape .It is the consciousness manifesting as motion , as gravitation , as magnetism ,etc......
इसी चित से सारा पसारा पसरा है सारी कायनात उपजी है ,इसे ही गत्यात्मक ऊर्जा या बल ,एक्टिव प्रिंसिपल भी कहा गया है ,यह किसी भी रूपाकार में प्रगटित हो सकती है। गति इसी गत्यात्मक चेतना का मूर्त रूप है ,परिणाम है। यह चेतना ही गति ,गुरुत्व (गुरुत्वाकर्षण )और चुम्बकत्व बन के प्रकट हुई है।
It is also manifesting as the actions of the body as thought force .It is the Supreme Spirit
विचार शक्ति (विचारणा बल )के रूप में यह हमारे (शरीर द्वारा किए गए )कर्मों के द्वारा भी प्रकट हो रहा है।
Ananda -This is the primordial characteristic of the Universe ,which is the greatest and most profound state of ecstasy that you can ever experience when you relate with your higher consciousness
आनंद सृष्टि का आदिम गुण (मूल बुनियाद है )यह परमानंद की सर्वोच्च अवस्था है चरम है आनंद का। इसका अनुभव आप तभी करते हैं जब उस उच्चतर चेतना से जुड़ते हैं।
Parabrahama -The Supreme Being in his Absolute aspect ; one who is beyond space and time .It is the essence of the Universe that is with form and without form .It is the Supreme Creator.
अपने परम (निरपेक्ष स्वरूप )में जो परम अस्तित्व है ,वह जो काल और अंतरिक्ष की सीमा से परे है ,जो अंतरिक्ष -काल से बद्ध नहीं है (अंतरिक्ष काल का भी जो सृष्टा है ).यही निराकार (निरंकार )स्वरूप है और साकार भी यही है।
सगुण मीठो खाँड़ सो निर्गुण कड़वो नीम ,
जाको गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।
Purushothama -This has different meanings .Purush means soul and Uthama means the supreme ,the Supreme spirit .It also means the supreme energy of force guiding us from the highest world.
पुरुषोत्तम -इसके अलग अलग अर्थ है ,परस्पर जुदा जुदा ,विभिन्न ,पुरुष का एक अर्थ है आत्मा (गीता में परमात्मा और आत्मा दोनों के लिए आया है अलग -अलग सन्दर्भों में ),उत्तम का अर्थ है सुप्रीम (सबसे ऊपर ,सबके ऊपर जिसके ऊपर कोई अन्य नहीं ,कुछ नहीं ); परम -आत्मा ,परम चेतन तत्व ।इसका एक अर्थ वह परम -ऊर्जा बाल भी लिया गया है ,वह परम शक्तिशाला ऊर्जा -बल जो हमें ऊंचे ते भी ऊंचे लोक से निर्देश दे रही है ,रास्ता दिखा रही है ,मार्ग -दर्शन कर रही है ,हमारा।
Purush also means Man ,and Purushothama is the energy that incarnates as an Avatar to help and guide Mankind and relate closely to the beloved Creation .
पुरुष का एक अर्थ पुरुष (लैंगिक संज्ञा ,आदमी या औरत ,मनुष्य मात्र )भी है और पुरुषोत्तमा (पुरुषोत्तम )वह ऊर्जा है जो मनुष्य रूप में पृथ्वी पर मानव मात्र की मदद और पथ -प्रदर्शक बन आती है। और जिसका करीबी रिश्ता रहता है हमारी सु-प्रिया कायनात से।
Paramatma -the supreme inner energy that immanent in every creature and in all beings ,living and non-living ......
परमात्मा -यह है वह परम आंतरिक ऊर्जा है जो जड़ और चेतन के कुदरती और अंदरूनी तौर पर संग है।
It's the indweller or the Antaryamin who resides formless or in any form desired .It's the force that can come to you whenever he wants to guide and help you .
यही हमारे हृदय प्रदेश में निवास करता है इसे ही अन्तर्यामी कहा गया है जो सब कुछ को देखता जानता है ,जो निराकार रूप में भी बना रहता है और वांच्छित हर स्वरूप -आकार में भी जिसकी मौजूदगी रहती है।जब चाहे अपनी कृपा हम पर आकर सकता है।
Sri Bhagvathi -the female aspect which is characterized as the Supreme Intelligence in action ,the Power (The Shakti ).It is referred to the Mother Earth (Divine Mother ) aspect of the creation .
Sametha -Together or in communion with .
Sri Bhagvathe - the Male aspect of the Creation which is unchangeable and permanent .
Namaha -Salutations or prostration to the Universe that is Om and also has the quality of Sat Chit Ananda , that is omnipresent , unchangeable and changeable at the same time .
The supreme spirit in a human form and formless ,the indweller that can guide and help in the feminine and masculine forms with the supreme intelligence . I seek your presence and guidance all the time .
This Mantra evokes the living God asking protection and freedom from all sorrow and suffering .It is a prayer that adores the great creator and liberator , who out of love and compassion manifests ,to protect us , in an earthly form .
This Moolmantra has given great peace and joy to the people all over the world ,who have chanted or even listened to it . It has the power to transport ones mind to the state of causeless love , and limitless joy .
The calmness that the mantra can give is to be experienced , not spoken about ....its the key with which any door to spiritual treasure can be opened . A tool which can be used to achieve all desires.
A medicine which cures all ills .The nectar that can set man free ! all auspiciousness and serenity is your simply by chanting or listening to this magnificent Moolmantra
The Moola Mantra Om Sat-Chit-Ananda Parabrahma Purushothama Paramatma Sri Bhagavathi Sametha Sri Bhagavathe Namaha Whenever you chant this Vedic Sanskrit Man...
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कविता :देशभक्ति के रंग ----- कमांडर निशांत शर्मा

कविता :देशभक्ति के रंग
----- कमांडर निशांत शर्मा।
तुझको मेरे मुझको तेरे प्यार का आभास हो,इंसान की इंसान से इंसानियत की आस हो।
कौम- औ- धरम के अफ़साने बहाने भूलकर , राम का रौज़ा रखूँ मैं ईद का उपवास हो।
देशभक्ति के जुनूं का रंग न कोई जात हो ,हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हैं न एहसास हो।
सेज चंदन की मिले या हो नसीब दो गज़ ज़मीं ,इस वतन पे हो न्योंछावर अंतिम मेरी सांस हो।
खो रहा चैन -औ -अमन मज़हब ही मानो मर्ज़ हो ,राम में हो कुछ रहीम गीता कुरआन -ए -ख़ास हो।
मंदिर मस्जिद गिरजे गुरद्वारे ही जैसे रूठें हों ,मंदिर में 'अल्लाह हु अकबर 'गिरजे में अरदास हो।
मुझसे मेरा नाम औ ईमान तुम न पूछिए ,उत्तर -दाख्खिन पूरब पश्चिम हम वतन सब काश हों।
हाथ सिर और नज़रें तिरछी जो उठे मैं काट दूँ ,लहराए तिरंगा रक्त में लथपथ जो मेरी लाश हो।
६२३ ,आफिसर्स रेजिडेंशियल एरिया ,इंडियन नेवल अकादमी ,एज़िमला (कन्नूर ) केरल

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

सुखु दुखु दोनो सम करि जानै अउरु मानु अपमाना। हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना




साधो मन का मानु तिआगउ ,

काम क्रोधु संगति दुरजन की ता ते अहिनिसि भागउ।

सुखु दुखु दोनो सम करि जानै अउरु मानु अपमाना।

हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना।

उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना।

जन नानक इहु खेलु कठनु है किनहूं गुरमुखि जाना।

भावार्थ :-हे संतजनों !(अपने )मन का अहंकार छोड़ दो। काम और क्रोध कुसंगति के तुल्य ही है ,इससे (भी )दिन रात (हर समय )दूर रहो। जो मनुष्य सुख -दुःख दोनों को एक जैसा जानता है और आदर और अनादर दोनों को एक जैसा जानता , जो ख़ुशी और ग़मी (दुखमय स्थिति )दोनों से निर्लिप्त (अलिप्त )रहता है ,सुख और दुःख दोनों ही जिसे छू नहीं पाते ,उसने जगत में जीवन का रहस्य समझ लिया है। (हे सन्त जनो !इस मनुष्य ने वास्तविकता प्राप्त कर ली है ,जो ) न किसी की खुशामद करता है न निंदा। (जहां कोई वासना , इच्छा किसी भी प्रकार की स्पर्श नहीं कर सकती )वही मुक्ति का पद खोज पाता है। (पर )हे नानक !यह (जीवन )खेल कठिन है। कोई विरला मनुष्य गुरु की शरण लेकर इसे समझता है।